क्षीर हो ! नीर हो ! रक्त हो !
धरा सब सोख लेती है अपने गर्भ में !
यह एकत्रित नहीं करती कुछ भी ऊपरी आवरण में ,
क्योंकि ज्ञात है इसको, मनुजों की दनुजता,
क्योंकि मानव जो होता है वर्तमान से कटा हुआ,
भविष्य से अनभिज्ञ !
क्यूँकि मानव जिसे वर्तमान के सुंदर निर्माण की ललक नहीं,
क्यूँकि मानव जो भविष्य के गर्भ में बबूल के बीज बो रहा होता है !
वह मानव जाति यदा,कदा, सर्वदा बिगुल छेड़ देती है,
अपने कब के गुजर चुके अतीत के लिए !
वह मानव जाति संग्राम कर सकती है,
गड़े मुर्दों के लिए !
वह मानव जाति वर्तमान को कलंकित कर सकती है,
अतीत के गौरव के लिए !
वह मानव जाति भूमि के ऊपरी परत को रक्तमयी कर सकती है, उसके कभी समृद्ध रह चुके किसी निचले परत के लिए !
इसलिए धरा सोख लेती है सम्पूर्ण कलंकों को, विजयों को,निर्जनता को, समृद्धि को , सभ्यताओं को, अपने गर्भ में !
क्योंकि उसे ज्ञात है अपने संतानों की मूर्खता,
क्योंकि मानव कलंकित करते आए हैँ हमेशा से अपने वर्तमान को, अपने किसी अतीत को गौरवमयी सिद्ध करने के लिए !
धरा सब सोख लेती है अपने गर्भ में !
यह एकत्रित नहीं करती कुछ भी ऊपरी आवरण में ,
क्योंकि ज्ञात है इसको, मनुजों की दनुजता,
क्योंकि मानव जो होता है वर्तमान से कटा हुआ,
भविष्य से अनभिज्ञ !
क्यूँकि मानव जिसे वर्तमान के सुंदर निर्माण की ललक नहीं,
क्यूँकि मानव जो भविष्य के गर्भ में बबूल के बीज बो रहा होता है !
वह मानव जाति यदा,कदा, सर्वदा बिगुल छेड़ देती है,
अपने कब के गुजर चुके अतीत के लिए !
वह मानव जाति संग्राम कर सकती है,
गड़े मुर्दों के लिए !
वह मानव जाति वर्तमान को कलंकित कर सकती है,
अतीत के गौरव के लिए !
वह मानव जाति भूमि के ऊपरी परत को रक्तमयी कर सकती है, उसके कभी समृद्ध रह चुके किसी निचले परत के लिए !
इसलिए धरा सोख लेती है सम्पूर्ण कलंकों को, विजयों को,निर्जनता को, समृद्धि को , सभ्यताओं को, अपने गर्भ में !
क्योंकि उसे ज्ञात है अपने संतानों की मूर्खता,
क्योंकि मानव कलंकित करते आए हैँ हमेशा से अपने वर्तमान को, अपने किसी अतीत को गौरवमयी सिद्ध करने के लिए !

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